Friday, 23 December 2011

विनय तिवारी जी का लेख- उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान नहीं

विनय तिवारी जी का लेख देख महसूस करे आज भारतीय सिक्षा का क्या हाल है. ?


सावधान!


- देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की साख पर उठते रहे सवाल -
भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों की साख लगातार गिर रही है. 2004 से 2009 तक आइआइटी मुंबई और जेएनयू, नयी दिल्ली को विश्व के टॉप 200 संस्थानों में शुमार किया गया था. आइआइटी मुंबई को 2009 में 163 वें, जबकि 2010 में 187 वें स्थान पर रखा गया था. लेकिन 2011 में दुनिया के टॉप 200 उच्च शिक्षण संस्थानों में एक भी भारतीय संस्थान को जगह नहीं मिली.
इस साल आइआइटी मुंबई को सूची में 300 से 350 वें स्थान के बीच रखा गया. विश्व में सर्वाधिक 26478 उच्च शिक्षण संस्थान भारत में हैं. यह संख्या चीन से सात गुना और अमेरिका से चार गुना है. लेकिन अलविदा होते साल 2011 में देश के उच्च शिक्षण संस्थानों की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठते रहे.
अर्नेस्ट एंड यंग की हालिया रिपोर्ट (इडीजीइ 2011) के मुताबिक भारत में उच्च शिक्षा पर होनेवाला खर्च 46,200 करोड़ रुपये है. 2020 तक इसमें सालाना 18 फ़ीसदी की दर से बढ़ोतरी का अनुमान है और 2020 तक यह खर्च 2,32,500 करोड़ रुपये हो जायेगा. उच्च शिक्षा पर खर्च में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद मौजूदा समय में इसमें नामांकन दर महज 11 फ़ीसदी है. सरकार 2020 तक इसे 20 फ़ीसदी करना चाहती है. ऐसे में साल 2011 को अलविदा कहते वक्त उन तात्कालिक कदमों पर एक निगाह डाली जा सकती है, जो देश में उच्च शिक्षा की स्थिति में बदलाव की नींव रख सके.
इस कड़ी में शिक्षाविद प्रोफ़ेसर यशपाल कहते हैं, शिक्षा की उपलब्धता बढ़ाना एक चुनौती है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाना, इससे भी बड़ी चुनौती है. सरकार सिर्फ़ संस्थानों की संख्या और नामांकन दर बढ़ाने पर जोर दे रही है, जबकि संस्थानों की गुणवत्ता उसकी प्राथमिकता में नहीं है. आलम यह है कि प्रसिद्ध आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थानों की गुणवत्ता भी पहले के मुकाबले कम हुई है. हमारी शिक्षा व्यवस्था में भ्रष्टाचार का बोलबाला है.
संस्थानों में शिक्षण की गुणवत्ता में कमी के कारण कोचिंग क्लासेस की संख्या बढ़ रही है, जहां छात्रों की रचनात्मकता खत्म हो रही है. सुधार के कदम के बारे में यशपाल कहते हैं, सबसे पहले नियामक संस्थाएं खत्म करनी होगी. आइआइटी जैसे संस्थानों को यूनिवर्सिटी का दर्जा दिया जाना चाहिए और शैक्षणिक मामलों में राजनीतिक हस्तक्षेप तत्काल बंद होना चाहिए. गौरतलब है कि हाल ही में इन्फ़ोसिस के संस्थापक एन नारायणमूर्ति और केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने भी आइआइटी छात्रों और संस्थानों के गिरते स्तर पर सवाल उठाया था.
उधर, शिक्षाविद मनीष सब्बरवाल कहते हैं, आर्थिक विकास दर के लिए शिक्षा और रोजगार की स्थिति महत्वपूर्ण कारक हो गये हैं. हमारी शिक्षा के समक्ष संख्या, गुणवत्ता और समग्रता की चुनौती है. शिक्षा पर नियंत्रण की सरकारी पहल से तीनों चीजें प्रभावित हो रही है. सब्बरवाल कहते हैं कि भारत में उच्च शिक्षा की नामांकन दर 11 फ़ीसदी है, जो वैश्विक दर की आधी है. देश में हर साल 80 लाख छात्र 12 वीं की परीक्षा पास करते हैं, लेकिन करीब 50 लाख ही उच्च शिक्षण संस्थानों में दाखिला लेते हैं और उनमें 30 लाख बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं.
दूसरी ओर हालात ऐसे हो गये है कि ग्रेजुएट कोर्स में दाखिले की कट ऑफ़ 100 फ़ीसदी तक पहुंच गयी है. 1987 में मात्र दस लाख छात्र 12 वीं की परीक्षा में शामिल हुए थे, जबकि इस साल 1.2 करोड़ छात्र शामिल हुए. लेकिन इस अनुपात में सीटों की संख्या नहीं बढ़ पायी. देश के 330 जिलों में उच्च शिक्षा में नामांकन दर राष्ट्रीय औसत से कम है.
स्थिति में सुधार के लिए सब्बरवाल सुझाव देते हैं, संस्थानों को डिग्री की फ़ैक्टरी में तब्दील करने की बजाय रोजगारपरक शिक्षा मुहैया कराने पर जोर देना चाहिए. संस्थानों को स्वायत्तता और पाठयक्रम में बदलाव करना बेहद जरूरी है. उच्च शिक्षा में लाइसेंस राज को खत्म कर शिक्षा की गुणवत्ता पर जोर देने की जरूरत है. स्कूलों में अंगरेजी की शिक्षा पर जोर देना चाहिए, क्योंकि अंगरेजी रोजगार के लिए खिड़की का काम करती है. स्कूल और कॉलेज के पाठयक्रम में वोकेशनल विषयों को शामिल किया जाना चाहिए.
- आज का भारत -
* दुनिया के टॉप 200 उच्च शिक्षण संस्थानों में एक भी भारतीय संस्थान नहीं
* खर्च में लगातार बढ़ोतरी के बावजूद उच्च शिक्षा में नामांकन दर महज 11 फ़ीसदी
- सुधार के सुझाव -
* नियामक संस्थाएं खत्म करनी होगी, राजनीतिक हस्तक्षेप तत्काल बंद होना चाहिए : प्रोफ़ेसर यशपाल
* संस्थानों को स्वायत्तता और पाठयक्रम में बदलाव करना बेहद जरूरी : मनीष सब्बरवाल


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